यह सिद्धांत कि स्वदेशी लोगों से सद्भावपूर्वक, पूरी जानकारी देकर और बिना किसी दबाव के परामर्श किया जाना चाहिए, तथा उनकी भूमि, संसाधनों या अधिकारों को प्रभावित करने वाले उपाय अपनाने से पहले उनकी सहमति प्राप्त की जानी चाहिए।
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यह सिद्धांत 2007 की स्वदेशी लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा के कई अनुच्छेदों में—जिनमें पुनर्वास, कानून और विकास परियोजनाओं से संबंधित अनुच्छेद शामिल हैं—और ILO अभिसमय 169 में, परामर्श के अपेक्षाकृत कमज़ोर रूप में, शामिल है। इसका कानूनी प्रभाव विवादित है: राज्य अक्सर इसकी व्याख्या वीटो के बजाय परामर्श के दायित्व के रूप में करते हैं। स्वदेशी भूमि पर खनन, बाँधों, पाइपलाइनों और पवन फ़ार्मों को लेकर होने वाले संघर्ष अक्सर इस प्रश्न पर टिके होते हैं कि सहमति उचित तरीके से माँगी गई थी या नहीं।